Kusum Ki Kheti: रबी सीजन की शुरुआत के साथ ही किसान भाई ऐसी फसलों के विकल्पों की तलाश में रहते हैं, जिनमें लागत और पानी की खपत कम हो, लेकिन मुनाफा भरपूर मिले। अगर आपके क्षेत्र में सिंचाई के साधनों की कमी है, तो कुसुम (Safflower) आपके लिए सबसे बेहतरीन तिलहन फसल साबित हो सकती है।
केंद्र सरकार ने भी रबी फसलों की MSP में सबसे बड़ी बढ़ोतरी कुसुम के लिए ही की है। आइए जानते हैं कुसुम की खेती कैसे की जाती है, इसके लिए सही समय क्या है और कैसे आप इससे बेहतर उत्पादन ले सकते हैं।
कुसुम की खेती क्यों है फायदेमंद? (MSP और लाभ)
सरकार का मुख्य फोकस कम पानी वाले इलाकों में तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देना है। इसी दिशा में कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने कुसुम की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में 675 रुपये प्रति क्विंटल की बड़ी वृद्धि की है।

कुसुम MSP में बढ़ोतरी (एक नज़र में)
| विवरण | आंकड़ा |
| पुरानी MSP | ₹6,540 प्रति क्विंटल |
| नई MSP | ₹7,215 प्रति क्विंटल |
| प्रति क्विंटल बढ़ोतरी | ₹675 |
| मुख्य उत्पादक राज्य | महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात |
| बीज में तेल की मात्रा | 24% से 36% तक |
| मुख्य उपयोग | खाने का तेल, साबुन, पेंट और वार्निश उद्योग |
कुसुम की बुवाई का सही समय और तरीका
कुसुम की अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए सही समय और सही तकनीक से बुवाई करना बेहद ज़रूरी है।
1. बुवाई का समय
कुसुम की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त समय सितंबर के अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के पहले सप्ताह तक माना जाता है।
2. कतार और बीज की दूरी
- कतार से कतार की दूरी: लगभग 45 सेंटीमीटर
- पौधे से पौधे की दूरी: लगभग 25 सेंटीमीटर
- बुवाई की गहराई: बीज को 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई में बोएं।
- बीज दर: 1 हेक्टेयर खेत के लिए 15 से 20 किग्रा बीज पर्याप्त होता है।
1.बीज उपचार (Seed Treatment):बीमारियों से सुरक्षा के लिए अनिवार्य कदम.

बुवाई से पहले बीजों का उपचार जरूर करें। इसके लिए प्रति किलो बीज को 3 ग्राम कैप्टान, थीरम या मैंकोजेब से उपचारित करें। इससे शुरुआती रोगों का खतरा कम हो जाता है।
2.खेत की तैयारी और उर्वरक प्रबंधन:मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने का तरीका.
- देसी खाद: खेत तैयार करते समय 15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर अच्छी तरह मिलाएं।
- रासायनिक खाद: प्रति हेक्टेयर 60 किलो नाइट्रोजन, 40 किलो फास्फोरस और 20 किलो पोटाश का प्रयोग करें।
3.सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण:कम पानी में बेहतर प्रबंधन.
- कुसुम मुख्य रूप से वर्षा आधारित (असिंचित) फसल है।
- यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो, तो बुवाई के 30 दिन बाद एक हल्की सिंचाई करें।
- खेत में खरपतवार दिखने पर समय-समय पर निराई-गुड़ाई अवश्य करें।
फसल की कटाई और संभावित उपज (Yield & Harvesting)
कुसुम की फसल को पककर तैयार होने में करीब 130 से 140 दिन का समय लगता है।
| सिंचाई की स्थिति | अनुमानित उत्पादन (प्रति हेक्टेयर) |
| असिंचित (Rainfed) | 10 से 12 क्विंटल |
| सिंचित (Irrigated) | 14 से 18 क्विंटल |
कम पानी की जरूरत, कम लागत और सरकार द्वारा बढ़ाई गई आकर्षक MSP (₹7,215/क्विंटल) के कारण कुसुम की खेती रबी सीजन में किसानों के लिए एक बहुत ही लाभदायक सौदा साबित हो सकती है। सही समय पर बुवाई और बीज उपचार की तकनीक अपनाकर किसान भाई इससे बेहतरीन मुनाफा कमा सकते हैं।








