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राजनीति, धर्म और समाज में विभाजन के प्रयास

On: February 13, 2025
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Samrendra Sharma
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समरेंद्र शर्मा. भारत एक धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता से भरा हुआ देश है, जहां धर्म, आस्था और अध्यात्म का गहरा प्रभाव है। यह देश न केवल अपनी धार्मिक आस्थाओं के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह नागरिकों की आस्था और विश्वास का सम्मान भी करता है। ऐसे आस्थावान लोगों के देश में अक्सर समाज को आपस में बांटने और विभाजकारी सियासत होती है।

पिछले दिनों राहुल गांधी का हाथरस की घटना के लिए मनुस्मृति को जिम्मेदार ठहराना इसी प्रयास का एक ताजा उदाहरण है। जब पूरा देश प्रयागराज में आस्था की डुबकी लगा रहा था, तब उनका बयान समाज में विभाजन और साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ाने वाला है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सहित पूरे संत समाज ने इस बयान पर आपत्ति जताई और माफी की मांग की। ऐसे बयान हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या राजनीति का उद्देश्य समाज में सुधार और एकता लाना है, या फिर इसे केवल विभाजित करना और समाज को अलग-अलग हिस्सों में बांटना है।

हाथरस की जघन्य घटना ने पूरे देश को शोक में डुबो दिया था। ऐसी स्थिति में नेताओं का घटना को जातिवाद या धार्मिक विवादों से जोड़कर राजनीति करना कहीं से भी उचित नहीं है। इस तरह के बयान समाज के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं और समाज के बीच विभाजन को और गहरा करते हैं।

क्या राजनीति में धर्म और जाति की आड़ लेकर अक्सर बयानबाजी करने वालों से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि बरसों तक उनकी सरकारों ने दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज के लिए क्या किया? उनकी सरकारों के कार्यकाल में हुईं ऐसी घटनाओं पर चुप्पी के क्या मायने हैं? संभव है कि ऐसे सवाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की दिशा में जा सकते हैं, लिहाजा इससे बचना चाहिए, लेकिन यह स्पष्ट है कि ऐसे बयानों का समाज पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। इसके बजाय, यह समाज को और अधिक विभाजित करता है।

यह सवाल भी उठता है कि क्या ऐसे बयान किसी खास राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा है, जो समाज में एकता की बजाय विभाजन को बढ़ावा देता है? यह राजनीतिक एजेंडे को भी स्पष्ट करता है, जिसमें वे समाज में धर्म और जाति के आधार पर असहमति और भेदभाव को तूल देने का प्रयास कर रहे हैं। क्योंकि राहुल गांधी को उनके भारत भ्रमण के दौरान ऐसे लोगों के समर्थन मिला, जिन पर विदेश में बैठकर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने का आरोप है। जाहिर है कि उनके ऐसे बयान से राष्ट्र विरोधियों का समर्थन मिलने के आरोपों और समाज के प्रति उनके इरादों की पुष्टि करते हैं।

जबकि जिम्मेदार नेताओं का कर्तव्य समाज में व्याप्त असमानताओं और बुराइयों का समाधान ढूंढना है, ना कि चुनावी लाभ और व्यक्तिगत राजनीति के लिए जातिवाद और धर्म का राजनीतिक खेल खेलना है? जब नेताओं के बयान केवल राजनीतिक लाभ के लिए होते हैं, तो यह समाज को एकजुट करने की बजाय उसे और अधिक विभाजित करता है।

समाज में बदलाव लाने के लिए हमें सभी प्रकार की असमानताओं, बुराइयों और अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर काम करना होगा। हमें यह समझना होगा कि किसी भी घटना को, चाहे वह हाथरस जैसा जघन्य अपराध हो या कोई अन्य सामाजिक समस्या, राजनीति से ऊपर उठकर देखना चाहिए। यदि हम राजनीति को धर्म और जाति के नाम पर विभाजित करने के लिए इस्तेमाल करेंगे, तो यह न केवल समाज को तोड़ेगा, बल्कि लोकतंत्र को भी कमजोर करेगा।

किसी भी समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसे एकजुट और सामंजस्यपूर्ण तरीके से चलाया जाए। राजनीति में धर्म और जाति का खेल समाज के विकास और एकता के लिए हानिकारक साबित होता है। जब नेता समाज में विभाजन का कारण बनते हैं, तो वे न केवल देश के नागरिकों के बीच घृणा फैलाते हैं, बल्कि लोकतंत्र को भी कमजोर करते हैं। नेताओं को यह समझना चाहिए कि समाज की एकता और लोकतंत्र की मजबूती के लिए हमें धर्म, जाति और राजनीति से ऊपर उठकर काम करना होगा।

लेखक पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं।

Admin

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