Vikram Samvat 2083 में अधिकमास के कारण हिंदू नववर्ष 12 नहीं बल्कि 13 महीनों का होगा

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Vikram Samvat 2083: अंग्रेजी कैलेंडर जहां जनवरी से शुरू होता है, वहीं हिंदू पंचांग में समय की गणना विक्रम संवत के अनुसार होती है, जिसकी शुरुआत चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से मानी जाती है। साल 2026 में आरंभ होने वाला विक्रम संवत 2083 इस कारण विशेष है क्योंकि यह सामान्य 12 नहीं बल्कि पूरे 13 महीनों का होगा। यह दुर्लभ स्थिति अधिकमास के कारण बन रही है, जो पंचांग और खगोलीय गणना का एक महत्वपूर्ण परिणाम है।

कब शुरू होगा विक्रम संवत 2083

विक्रम संवत 2083 का आरंभ 19 मार्च 2026 से होगा। इसी दिन गुड़ी पड़वा और वासंती नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाएगी। इस नवसंवत में ज्येष्ठ माह में अधिकमास जुड़ने के कारण वर्ष की संरचना पूरी तरह बदल जाएगी और व्रत-त्योहार सामान्य तिथियों से 15 से 20 दिन बाद पड़ेंगे।

ज्येष्ठ अधिकमास 2026: 58–59 दिनों का अनोखा संयोग

विक्रम संवत 2083 में ज्येष्ठ माह ही अधिकमास होगा, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। अधिक ज्येष्ठ मास 17 मई 2026 से 15 जून 2026 तक रहेगा, जबकि सामान्य ज्येष्ठ मास 22 मई 2026 से 29 जून 2026 तक चलेगा। इस दौरान दोनों महीने एक-दूसरे के साथ ओवरलैप करेंगे, जिससे ज्येष्ठ माह लगभग 58 से 59 दिनों का हो जाएगा। यही कारण है कि पंचांग में 13 महीनों की गणना होगी।

अधिकमास क्या है और क्यों जुड़ता है

हिंदू पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित है। एक चंद्र वर्ष लगभग 354–355 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष 365 दिनों का। इन दोनों में हर वर्ष लगभग 10–11 दिनों का अंतर बनता है। यही अंतर हर 32 महीने और 16 दिनों में इतना बढ़ जाता है कि पंचांग को संतुलित रखने के लिए एक अतिरिक्त महीने को जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।

पुरुषोत्तम मास का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब अधिकमास उत्पन्न हुआ तो किसी भी देवता ने उसे स्वीकार नहीं किया। तब भगवान विष्णु ने इसे अपने संरक्षण में लेकर इसे ‘पुरुषोत्तम मास’ का नाम दिया। इसी कारण यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और इसे अत्यंत पवित्र काल कहा गया है। मान्यता है कि इस समय किया गया जप, तप, ध्यान, भक्ति और दान विशेष पुण्यफल देता है और जीवन में शांति व सौभाग्य लाता है।

अधिकमास में क्या करें और क्या न करें

धार्मिक परंपराओं के अनुसार अधिकमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन, भूमि पूजन और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस अवधि में किए गए शुभ संस्कार अपेक्षित फल नहीं देते। वहीं यह समय व्रत, भगवान विष्णु की पूजा, श्रीमद्भागवत पाठ, दान और आत्मिक साधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

व्रत-त्योहारों पर क्या पड़ेगा असर

ज्येष्ठ अधिकमास के कारण विक्रम संवत 2083 में आने वाले अधिकांश व्रत और पर्व अपने निर्धारित समय से 15 से 20 दिन आगे खिसक जाएंगे। यह पंचांग की स्वाभाविक व्यवस्था है, जिससे हिंदू त्योहार ऋतुओं के अनुरूप बने रहते हैं। अगर अधिकमास की व्यवस्था न हो तो समय के साथ त्योहारों का ऋतु संतुलन बिगड़ सकता है।

क्यों जरूरी है अधिकमास की व्यवस्था

हिंदू धर्म में लगभग सभी व्रत और त्योहार चंद्र तिथियों पर आधारित होते हैं। अधिकमास की व्यवस्था के बिना हर साल त्योहार लगभग 10 दिन पीछे खिसकते चले जाएंगे, जिससे होली शीत ऋतु और दिवाली वर्षा ऋतु में आने लगेगी। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने अधिकमास की वैज्ञानिक और धार्मिक व्यवस्था बनाई, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।