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किस शक्ति की बात कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार डॉ नीरज गजेंद्र- जिससे बढ़ती है बोलने, सोचने और निर्णय लेने की क्षमता

On: February 3, 2025
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Neeraj Ganedra
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डॉ. नीरज गजेंद्र: ऋग्वेद में मां सरस्वती को महावाणी कहा गया है। वह शक्ति जो मनुष्य को बोलने, विचार करने और निर्णय लेने की क्षमता देती है। बिना ज्ञान के न तो आत्मनिर्भरता संभव है। और न ही समाज की उन्नति। इसी कारण, बसंत पंचमी के दिन ज्ञान और विद्या की देवी सरस्वती की विशेष आराधना की जाती है। बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं है। यह जीवन में नवीन ऊर्जा, सृजनात्मकता और प्रगति का संदेश देती है। आधुनिक विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि व्यक्ति की सोच, स्मरणशक्ति और निर्णय क्षमता मौसम और वातावरण से प्रभावित होती है। बसंत में प्रकृति नई चेतना प्राप्त करती है। यह समय मन और मस्तिष्क को इनोवेशन और लर्निंग के लिए सर्वश्रेष्ठ बनाता है।

बसंत पंचती पर विद्या, संगीत, कला और बौद्धिक चेतना की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की विशेष पूजा की जाती है। प्रश्न उठता है कि यह पूजन क्यों। क्या केवल धार्मिक आस्था के कारण। या इसके पीछे कोई गहरा वैज्ञानिक और दार्शनिक कारण भी है। न्यूरोसाइंस के अनुसार, बसंत का मौसम मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को अधिक सक्रिय करता है। इस समय की गई पढ़ाई और ध्यान लंबे समय तक याद रहते हैं। शायद इसी कारण भारत में इस दिन विद्यार्थियों को विद्या आरंभ करने की परंपरा है। बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र पहनने की परंपरा है। मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि पीला रंग मस्तिष्क को अधिक सक्रिय बनाता है और सकारात्मक ऊर्जा देता है। मां सरस्वती को वीणा धारण करने वाली देवी माना गया है। वीणा केवल एक वाद्य यंत्र नहीं। यह जीवन में संतुलन और सामंजस्य का प्रतीक है। आधुनिक शोध बताते हैं कि संगीत सुनने या सीखने से मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्ध सक्रिय होते हैं, जिससे निर्णय क्षमता और विश्लेषणात्मक सोच बेहतर होती है।

आज की दुनिया तकनीक और प्रतिस्पर्धा से भरी हुई है। यहां मां सरस्वती सिखाती हैं कि केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं, सीखी गई चीज़ों को सही दिशा में लगाना ही सफलता की कुंजी है। आज फेक न्यूज, अंधविश्वास और बिना सोचे-समझे निर्णय लेने का दौर है। सरस्वती तर्कशीलता की देवी हैं। यदि हम तर्क और विज्ञान के आधार पर सोचें, तो जीवन में कम गलतियां होंगी और सफलता की संभावना अधिक होगी। चाहे कोई व्यवसाय हो। शिक्षा हो या कला का क्षेत्र, रचनात्मकता सबसे महत्वपूर्ण गुण है।

स्वामी विवेकानंद का जीवन इस बात का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है कि जब कोई व्यक्ति सरस्वती की उपासना करता है, तो उसका जीवन कैसे बदलता है। जब उन्होंने रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात की, तो यह ज्ञान केवल शाब्दिक नहीं, बल्कि अनुभव के स्तर पर उतरने लगा। आइंस्टीन को ही लीजिए। उनका सापेक्षता का सिद्धांत केवल गणनाओं का परिणाम नहीं था। गहन चिंतन और अंतर्दृष्टि का भी नतीजा था। वे स्वयं कहते थे कि उनकी खोजें केवल बुद्धि से संभव नहीं थीं। निकोला टेस्ला का जीवन भी इसी का उदाहरण है। वे कहते थे कि उनके आविष्कार केवल तकनीकी नहीं थे, वे एक उच्च चेतना से प्रेरित थे। जो व्यक्ति ज्ञान को अपने जीवन का मार्गदर्शक बना लेता है, उसका भविष्य सुरक्षित हो जाता है। मां सरस्वती हमें यही सिखाती हैं कि केवल किताबों का अध्ययन पर्याप्त नहीं, बल्कि हमें सही निर्णय लेने की कला भी सीखनी होगी। निर्णय तभी सार्थक होते हैं जब वे विवेक, नैतिकता और समाज कल्याण से जुड़े हों।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक-राजनीतिक रणनीतियों के विश्लेषक हैं)

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