दिल्ली में जारी विरोध-प्रदर्शनों और पुलिस प्रशासन द्वारा लागू की गई पाबंदियों को लेकर दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। अदालत ने नागरिक अधिकारों और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर देते हुए साफ किया कि शहर में आम लोगों की आवाजाही को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन इसका आयोजन पुलिस और कानून के तय दायरे में ही होना चाहिए।
आवाजाही और इंटरनेट सेवाओं पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कुछ प्रमुख अंतरिम निर्देश जारी किए, जिससे आम जनता को पाबंदियों के कारण अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े:
- निर्बाध इंटरनेट सेवाएं: अदालत ने आदेश दिया कि राजधानी में इंटरनेट सेवाएं बिना किसी रुकावट के लगातार चालू रहनी चाहिए।
- आवाजाही पर रोक नहीं: शहर में लोगों का आवागमन कानून के अनुसार सामान्य रूप से जारी रहना चाहिए। कानून-व्यवस्था की आड़ में लगाए गए बैरिकेड्स की आवश्यकता की पुनः समीक्षा करने का निर्देश दिया गया है।
- मेट्रो और ट्रेनों का संचालन: कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा कारणों से मेट्रो और रेल सेवाओं को नियंत्रित तरीके से चलाया जा सकता है, लेकिन इनका संचालन पूरी तरह बंद नहीं किया जाना चाहिए।
- गैरकानूनी हिरासत पर रोक: शांतिपूर्ण और निहत्थे नागरिकों को अनावश्यक हिरासत में न रखा जाए, विशेषकर उन क्षेत्रों के बाहर जहाँ धारा 163 लागू नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट परिसर से पाबंदी हटाने का आदेश: अदालत को जब यह अवगत कराया गया कि सुप्रीम कोर्ट के आसपास भी धारा 163 लागू की गई है, तो पीठ ने अधिकारियों को इसे तुरंत हटाने का निर्देश दिया, ताकि आम जनता और याचिकाकर्ताओं की न्याय तक पहुँच बाधित न हो।
प्रदर्शन का अधिकार बनाम पुलिस नियम
सुप्रीम कोर्ट ने उल्लेख किया कि मुख्य प्रश्न यह है कि पुलिस द्वारा लगाए गए प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत किस सीमा तक तर्कसंगत हैं।
पीठ ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा, “आपको विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, इस पर कोई विवाद नहीं है। पर प्रदर्शन का तरीका पुलिस एक्ट के दायरे में होना चाहिए। विरोध प्रदर्शन का मौलिक अधिकार पुलिस नियमों से ऊपर नहीं हो सकता है।”
पुलिस कार्रवाई को चुनौती देती दो याचिकाएं
इस मामले में शीर्ष अदालत के समक्ष दो प्रमुख याचिकाएं रखी गई थीं:
- अवमानना याचिका: अधिवक्ता शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी द्वारा दाखिल याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और DMRC अध्यक्ष डी. थारा के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग की गई है। इसमें आरोप लगाया गया कि 9 अक्टूबर के अदालती आदेशों का उल्लंघन किया गया।
- एहतियातन हिरासत को चुनौती: वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी द्वारा दायर याचिका में विपक्षी नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्रियों को एहतियातन हिरासत में लिए जाने के कदम को चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया कि मौलिक अधिकारों को दबाने के लिए एहतियातन हिरासत का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस व केंद्र सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा, जबकि वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने त्वरित सुनवाई के लिए अदालत का आभार व्यक्त किया। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। खबरें पढ़ने के लिए babapost.in पर विजिट करें।








