महासमुंद. छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में किसानों को टिकाऊ खेती, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और रासायनिक उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल के प्रति जागरूक करने के लिए ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत कृषक चौपाल एवं किसान संगोष्ठियों का आयोजन किया गया। जिले के पांच स्थानों पर आयोजित इन कार्यक्रमों में कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को प्राकृतिक खेती, जैविक खाद और मिट्टी की सेहत बनाए रखने के वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी दी।
महासमुंद जिले के महासमुंद, बागबाहरा, बसना, पिथौरा और सरायपाली विकासखंडों में आयोजित इन कार्यक्रमों का उद्देश्य खेती में रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करना और किसानों को पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित करना रहा।
इन पांच स्थानों पर हुई कृषक चौपाल और संगोष्ठी
खेत बचाओ अभियान के अंतर्गत जिले के पांच स्थानों पर किसानों के साथ संवाद किया गया। इसके तहत महासमुंद विकासखंड के पिटियाझर, बागबाहरा के खल्लारी, बसना के अकोरी, पिथौरा के किशनपुर और सरायपाली के केना ग्राम पंचायत एवं सहकारी समितियों में कार्यक्रम आयोजित हुए।
कृषक चौपाल के दौरान किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने, पोषक तत्वों का संतुलन सुनिश्चित करने और लंबे समय तक कृषि उत्पादन क्षमता बरकरार रखने के उपायों से अवगत कराया गया।
30 नवंबर तक चलेगा देशव्यापी खेत बचाओ अभियान
कृषि विभाग की ओर से 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक देशव्यापी खेत बचाओ अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के माध्यम से किसानों और आम नागरिकों को रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से बचने, मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता संरक्षित रखने तथा प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
अभियान के तहत किसानों को यह समझाने पर जोर दिया जा रहा है कि बेहतर कृषि उत्पादन के लिए केवल उर्वरकों की मात्रा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। मिट्टी की वास्तविक जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों का इस्तेमाल करना भी उतना ही जरूरी है।
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यूरिया और डीएपी का संतुलित उपयोग करने की सलाह
कृषक संगोष्ठियों में कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से मिट्टी के स्वास्थ्य और उसकी प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए खेती में मृदा स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाना आवश्यक है।
किसानों को हरी खाद, नील-हरित काई, जैव उर्वरक, जैविक खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग के बारे में भी जानकारी दी गई। इसके साथ ही यूरिया और डीएपी पर निर्भरता कम करने के लिए एनपीके, एसएसपी, नैनो यूरिया तथा नैनो डीएपी के उचित इस्तेमाल के बारे में जागरूक किया गया।
विशेषज्ञों ने सलाह दी कि किसान उर्वरकों का चयन अपनी फसल की जरूरत और मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों के आधार पर करें। इसके लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड में दी गई सिफारिशों का पालन करना महत्वपूर्ण है।
प्राकृतिक खेती से मिट्टी की सेहत बचाने पर जोर
कार्यक्रमों में प्राकृतिक खेती और जैविक खेती को टिकाऊ कृषि के महत्वपूर्ण विकल्पों के रूप में प्रस्तुत किया गया। किसानों को पारंपरिक कृषि ज्ञान के साथ आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का समन्वय करने के लिए प्रेरित किया गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और कृषि उत्पादन को लंबे समय तक स्थिर रखने के लिए संतुलित पोषण प्रबंधन, जैविक पदार्थों का उपयोग और जरूरत के मुताबिक उर्वरकों का प्रयोग महत्वपूर्ण है।
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23 अक्टूबर को इन गांवों में होंगे अगले कार्यक्रम
कृषि उप संचालक एफ.आर. कश्यप ने बताया कि खेत बचाओ अभियान के तहत 23 अक्टूबर को जिले के विभिन्न विकासखंडों में कृषक चौपाल एवं संगोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, महासमुंद विकासखंड के झालखम्हरिया और कनेकेरा, बागबाहरा के सिर्रीपठारीमुड़ा और सुखरीडबरी, पिथौरा के अमलीडीह और कुम्हारीमुड़ा, बसना के चनाट और बड़ेढाबा तथा सरायपाली के कोटद्वारी और तोषगांव में किसानों को जागरूक किया जाएगा।
इन कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों तक मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग और प्राकृतिक खेती से जुड़ी जानकारियां पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि कृषि भूमि की गुणवत्ता सुरक्षित रखते हुए टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिल सके। खबरें पढ़ने के लिए babapost.in पर विजिट करें।

