नई दिल्ली. आज सुप्रीम कोर्ट में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की ओर से दायर याचिका पर अहम सुनवाई हुई। इस मामले में ममता बनर्जी की पार्टी को बड़ा झटका लगा, क्योंकि सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाया जा सकता कि उसमें केंद्र सरकार के कर्मचारी शामिल हैं।
कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों पर भरोसा रखने की सलाह दी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मान लेना गलत है कि केंद्र सरकार का कोई कर्मचारी किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ ही काम करेगा। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और सरकारी कर्मचारियों पर भरोसा बनाए रखना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को अपने विवेक के अनुसार अधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार है।
कपिल सिब्बल ने उठाए सवाल
टीएमसी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के एक सर्कुलर का हवाला देते हुए कहा कि इसमें विभिन्न स्तरों पर विसंगतियों की आशंका जताई गई है। उन्होंने दलील दी कि केवल केंद्र सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मचारियों को पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त करना राज्य सरकार की निष्पक्षता पर सवाल उठाने जैसा है।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची की अहम टिप्पणी
इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि केवल यह तथ्य कि कोई अधिकारी केंद्र सरकार का कर्मचारी है, अपने आप में गलत नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि मतगणना प्रक्रिया में काउंटिंग एजेंट, सुपरवाइजर, माइक्रो ऑब्जर्वर और अन्य अधिकारी भी मौजूद रहते हैं, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है।
जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि अदालत यह नहीं मान सकती कि चुनाव आयोग की अधिसूचना नियमों के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर के अधिकारी शामिल होते हैं और केवल एक वर्ग के अधिकारियों की मौजूदगी को अवैध नहीं कहा जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, टीएमसी ने कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान वोटों की गिनती में केवल केंद्र सरकार और PSU कर्मचारियों को पर्यवेक्षक बनाने के फैसले का विरोध किया गया था।

टीएमसी का कहना था कि इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। वहीं चुनाव आयोग ने इसे पारदर्शी और व्यवस्थित मतगणना प्रक्रिया के लिए जरूरी कदम बताया था।
सुप्रीम कोर्ट के रुख के क्या मायने हैं?
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख को चुनाव आयोग के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। अदालत के फैसले से यह साफ संकेत मिला है कि चुनावी प्रक्रियाओं में आयोग के प्रशासनिक विवेक को महत्व दिया जाएगा, जब तक कि किसी नियम का स्पष्ट उल्लंघन साबित न हो।









