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एल-नीनो की चुनौती को अवसर में बदलें, दलहन-तिलहन की खेती पर मिलेगा 15 हजार रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन

On: June 24, 2026
El Nino Alert
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रायपुर. छत्तीसगढ़ में वर्ष 2026 के दौरान एल-नीनो (El Nino) के प्रभाव के कारण सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में कृषि विभाग ने किसानों को मौसम आधारित खेती अपनाने और फसल चयन में सावधानी बरतने की सलाह दी है। विभाग का कहना है कि यदि किसान समय रहते फसल विविधीकरण अपनाते हैं तो कम बारिश की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन और आय सुनिश्चित कर सकते हैं।

कम वर्षा में धान के बजाय वैकल्पिक फसलों पर जोर

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अपलैंड और कम जलधारण क्षमता वाली भूमि में धान की खेती जोखिमपूर्ण साबित हो सकती है। ऐसे क्षेत्रों में किसानों को दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की खेती को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है। कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने वाली फसलें मौसम संबंधी जोखिम को कम करती हैं और उत्पादन लागत भी नियंत्रित रखती हैं।

कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसलें

कृषि विभाग ने किसानों को निम्न फसलों को अपनाने की सलाह दी है—

  • अरहर
  • मूंग
  • उड़द
  • कुल्थी
  • मूंगफली
  • तिल
  • रामतिल
  • कोदो
  • कुटकी
  • रागी

ये फसलें कम वर्षा की परिस्थितियों में भी अच्छी उपज देने की क्षमता रखती हैं और किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं।

दलहन-तिलहन खेती पर मिलेगा 15 हजार रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन

राज्य सरकार किसानों को फसल विविधीकरण के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित कर रही है। योजना के तहत अपलैंड क्षेत्रों में धान की जगह दलहन एवं तिलहन फसलों की खेती करने वाले किसानों को 15 हजार रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।

यह पहल न केवल जल संरक्षण को बढ़ावा देगी बल्कि किसानों को कम लागत में अधिक लाभ कमाने का अवसर भी प्रदान करेगी। इससे खेती को मौसम के अनुकूल और अधिक टिकाऊ बनाया जा सकेगा।

समर्थन मूल्य पर होगी फसलों की खरीदी

दलहन और तिलहन फसलों की खरीदी प्रधानमंत्री आशा योजना के अंतर्गत समर्थन मूल्य पर की जाती है। इससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलने की संभावना बढ़ जाती है और बाजार में मूल्य गिरने की स्थिति में भी आर्थिक सुरक्षा मिलती है।

समर्थन मूल्य की सुविधा किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

किसानों की आय बढ़ाने में मददगार हैं दलहन और तिलहन फसलें

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि दलहन एवं तिलहन फसलें केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि कृषि भूमि के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी हैं। इन फसलों की उत्पादन लागत अपेक्षाकृत कम होती है जबकि बाजार में इनकी मांग लगातार बनी रहती है।

विशेष रूप से दलहनी फसलें भूमि में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। इसका लाभ आगामी फसलों को भी मिलता है और कुल कृषि उत्पादकता में सुधार होता है।

मृदा स्वास्थ्य सुधारने में अहम भूमिका

दलहन फसलें मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। लगातार धान की खेती से प्रभावित होने वाली भूमि को पुनर्जीवित करने में भी ये फसलें सहायक होती हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सकती है और खेती अधिक लाभकारी बन सकती है।

मध्यम भूमि वाले किसानों को अल्प अवधि की धान किस्में अपनाने की सलाह

कृषि विभाग ने मध्यम भूमि वाले किसानों को भी मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों का चयन करने की सलाह दी है। अल्प अवधि वाली किस्में कम पानी में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं और संभावित सूखे की स्थिति में नुकसान को कम कर सकती हैं।

जल उपलब्धता में कमी होने पर ऐसी किस्में किसानों के लिए सुरक्षित विकल्प साबित हो सकती हैं।

मौसम आधारित कृषि रणनीति से मिलेगा फायदा

विशेषज्ञों का मानना है कि एल-नीनो जैसी परिस्थितियों में पारंपरिक खेती की बजाय मौसम आधारित कृषि रणनीति अपनाना समय की आवश्यकता है। फसल विविधीकरण, कम पानी वाली फसलों का चयन और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर किसान संभावित सूखे के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे वैज्ञानिक सलाह के अनुरूप फसलों का चयन करें और उपलब्ध प्रोत्साहन योजनाओं का अधिकतम लाभ लें। इससे न केवल जोखिम कम होगा बल्कि कृषि आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव होगी।

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